आर्थिक संकट से पार पाने के लिए कई तरह के सामाजिक खर्चों में कटौती की तैयारी कर रही हैं यूरोपीय सरकारें
तीखी आलोचना - सामाजिक, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मदों में कटौती के सरकारी प्रस्ताव को लेकर अंतरराष्ट्रीय एजेंसी ऑक्सफेम ने तीखी आलोचना करते हुए ऐसी नीतियों को आर्थिक और सामाजिक रूप से बेहूदा करार दिया है। एजेंसी का कहना है कि ऐसी नीतियों से 2025 तक 2.5 करोड़ और यूरोपियन गरीबी का शिकार हो सकते हैं।
जहां एक ओर यूरोपीय देशों की सरकारें मौद्रिक सख्ती की नीतियां अपनाने पर जोर दे रही हैं वहीं दूसरी ओर वैश्विक एजेंसी ऑक्सफेम ने कहा है कि अगर सरकारें इन जटिल नीतियों को आगे जारी रखेंगी तो 2025 तक 2.5 करोड़ यूरोपीय लोग गरीबी के चंगुल में फंस सकते हैं। एजेंसी ने ऐसी नीतियों को नैतिक और आर्थिक लिहाज से बेहूदा करार दिया है।
ऑक्सफेम ईयू की प्रमुख नतालिया अलोंसो ने कहा,'आर्थिक संकट से जूझ रहे यूरोप में दशकों के सामाजिक अधिकार छिनने का भय छाया है। सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मदों में खर्च में अत्यधिक कटौती तथा कर्मचारियों के कम अधिकार और अप्रासंगिक कर लाखों यूरोपियन को गरीबी के ऐसे कुचक्र में धकेल रहा है
जिससे बाहर आने में पीढिय़ां गुजर जाएंगी। यह नैतिक और आर्थिक रूप से बेहूदा कदम है।' उन्होंने कहा,'इन सख्त नीतियों से सिर्फ 10 फीसदी बेहद अमीर यूरोपियन को लाभ हो रहा है जिनकी संपत्ति बढ़ रही है।
ग्रीस, आयरलैंड, इटली, पुर्तगाल, स्पेन और यूके जैसे देश जो कि बेहद तेजी से इन कठोर कदमों को उठा रहे हैं वे जल्द ही दुनिया में सामाजिक तौर पर सबसे असंतुलित देशों में शुमार हो जाएंगे। इनके नेताओं को इस पहलू पर भी समय रहते विचार करना चाहिए। उदाहरणस्वरूप यूके और स्पेन में अमीर और गरीब का अंतर उतना ही हो जाएगा जितना कि दक्षिण सूडान या पराग्वे में है।'
एजेंसी का कहना है कि अगर इन कठोर नीतियों पर नियंत्रण नहीं लगाया गया तो 2025 तक 1.5 से 2.5 करोड़ यूरोपियन गरीबी के गर्त में चले जाएंगे।
ऑक्सफेम ने चेतावनी देते हुए कहा है कि गरीबी के गर्त में समाये यूरोपियनों का आंकड़ा 14.6 करोड़ तक पहुंच जाएगा, जो कि कुल आबादी का चौथाई है। ऑक्सफेम ने कहा कि सामाजिक खर्च में कटौती के मामले में 1980 और 90 के दशक में लैटिन अमेरिका, दक्षिण पूर्व एशिया और अफ्रीका में की गई इस प्रकार की कटौती से सीख लेनी चाहिए।
इन क्षेत्रों के कुछ देशों को रास्ते पर लौटने में दो दशक का वक्त लग गया।
एजेंसी का कहना है कि कठोरता के कदमों के और भी कई विकल्प हैं। यूरोपीय सरकारों को एक नए आर्थिक और सामाजिक मॉडल लाने का प्रयास करना चाहिए जिसमें कि जनता में निवेश हो, लोकतंत्र मजबूत हो और कर का प्रासंगिक ढांचा बने।
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